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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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देवकीबाई धर्मशाला में आये हुए कुछ महिने बीत गए । दिन का बहुत सारा समय मैं साधनभजन में व्यतीत करता था । एक दिन मेरे नित्यक्रम के मुताबिक मैं सुबह गंगाघाट पर जाने के लिए निकल पडा । जाते वक्त द्वार पर ताला लगाने के बजाय सिर्फ स्टोपर लगाने की मुझे आदत थी । उस दिन भी मैंने कमरे के द्वार पर स्टापर लगाई और चल पडा । कुछ देर गंगातट पर विहार करने के बाद जब मैं धर्मशाला में वापिस लौटा तो मेरे आश्चर्य के बिच मैंने अपना कमरा खुला पाया । अंदर जाकर देखा तो मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । जमीन पर, जहाँ मेरे बैठने की जगह थी और जहाँ मैंने कम्बल बिछाया था, एक पचास-पचपन साल के काषाय वस्त्रधारी संतपुरुष बिराजमान थे । उनकी मुखाकृति आकर्षणविहीन और श्यामवर्णी थी । मुडंन से उनका मस्तिष्क चमक रहा था । उनकी आँखे तेजस्वी और प्रभावशाली थी । एक अपरिचित व्यक्ति को मेरे बन्द कमरे के अंदर देखकर मुझे हैरानी हुई । यूँ कहो की उस महात्मा पुरुष का साहस देखकर मैं दंग रह गया । मैं क्या करूँ यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था ।

बडी विनम्रता से मैंने संन्यासी महापुरुष को प्रणाम किया और उनके आनेकी वजह पूछी । उन्होंने स्मित करते हुए उत्तर दिया, मैं आपको पहेली बार मिल रहा हूँ । धूमता हुआ यहाँ चला आया । यह गुजराती धर्मशाला है इसलिए यहाँ कभी कभी आता रहता हूँ ।

मैंने प्रश्न किया, तो क्या आप गुजराती है ?

उन्हों ने कहा, हाँ । अफ्रिका में कुछ साल नौकरी करने के बाद मैंने संन्यास लिया है । यहाँ मायाकुण्ड के पास मेरी पर्णकुटि है । मैं छह महिना ऋषिकेश और बाकी छह महिना पंजाब में रहता हूँ । पंजाब की प्रजा बहुत सेवाभावी और धार्मिक है तथा साधुसंतो का सन्मान करती है ।

कुछ देर तक कमरे में शान्ति बनी रही । रास्ते पर मुसाफिरों की चहलपहल की धीमी आवाज के अलावा ओर कुछ सुनाई नहीं देता था । मेरे कमरे में रामकृष्णदेव और विवेकानंद की तसवीरें थी । मैं तसवीरों की ओर देखकर साधुपुरुष के शब्दों पर गौर कर रहा था ।

अचानक उन्होंने प्रश्न किया, क्या आपको यह जगह पसन्द है ?

मैंने उत्तर दिया, हाँ, पसन्द है । ऋषिकेश की पुण्यभूमि, गंगा का तट और ये सुंदर, शांत जगह – पसन्द न आने की कोई वजह नहीं है । साधनभजन में मेरा समय अच्छी तरह से व्यतीत होता है । यहाँ पूरी तरह से ठरीठाम होने के बाद माताजी को बुलाना चाहता हूँ । उनको यह जगह अवश्य पसंद आयेगी । प्रभुस्मरण में उनका वक्त अच्छी तरह से गुजर जाएगा ।

एकाद क्षण महात्मा पुरुष शांत रहे । फिर अपने बाँये हाथ की अंगुलि को नाक पर लगाकर बोलने लगे, एसा नहीं होगा । ईश्वर की एसी इच्छा नहीं है । तुम यहाँ केवल एक साल ही रह पाओगे । न उससे एक दिन ज्यादा और न एक दिन कम, पूरे एक साल ।

मुझे उनका कथन विचित्र लगा । क्या उनकी बात विश्वास करने जैसी थी ?

मैंने कहा, मेरी मरजी तो यहाँ रहने की है । मेरे दिल में वैराग्य और ईश्वरप्रेम भरा है । एसे शांत और एकांत स्थान को छोडकर कहीं ओर जाने का मेरा मन नहीं है । मुझे ऋषिकेश छोडकर कहीं नौकरी या व्यवसाय करने की ईच्छा नहीं है ।

ये तो मै समझ सकता हूँ, उन्होंने कहा, मैंने ये कब कहा कि आप संसार की माया में फँसनेवाले है । मेरा तो सिर्फ यह कहेना था कि ये स्थान में आप कुल मिलाकर एक साल रहोगे । फिर आपको जलराशि के बगल में अर्थात् किसी नदी, तालाब या समंदर के पास शांत और सुंदर स्थान मिलेगा । वहीँ पर आपका आध्यात्मिक विकास होगा । आप भिन्न भिन्न साधना पद्धतियों का आलंबन लेकर अवनविन अनुभवों से संपन्न होंगे । मगर जब तक आप काली या हनुमानजी को अपना ईष्ट देव नहीं मानोगे तब तक आपको शान्ति नहीं मिलेगी ।

उन्होंने आगे कहा, धर्मशाला का केस पूरे देढ साल तक चलेगा और आखिरकार ट्रस्टियों की जीत होगी । मगर जब केस का फैंसला होगा तब आप यहाँ नहीं होंगे । आप तो साधना में रत होंगे । साधना करके आप आध्यात्मिक अनुभूति के सर्वोत्तम शिखर पर पहूँच जाओगे । तुम्हारी वर्तमान साधना तो कुछ भी नहीं है । कठिन साधना का वक्त अभी आनेवाला है । एक दिन एसा आयेगा जब दुनिया के लोग आपकी पूजा करेंगे और तुम्हारे वचनों से शान्ति का मार्ग पायेंगे । तब मैं आपको पुनः मिलूँगा । तब आप मुझे पहचान लेना क्योंकि तब आपके इर्दगिर्द कई लोग धूमते होंगे ।

उनकी भविष्यवाणी मेरे लिए बिल्कुल नयी थी । मै यह मानता था कि ईश्वर की कृपा से या साधना की सिद्धि से महात्मा पुरुष किसी भी व्यक्ति के भूत, भावि और वर्तमान का पता लगा सकते है । मगर मेरे बारे में उन्होंने जो भविष्यकथन किया था उसके सत्यता की कसौटी केवल वक्त आने पर ही हो सकती थी । तब तक यह महापुरुष तथा उनके वचनों के बारे में किसी नतीजे पर पहूँचने का काम मेरे लिए मुश्किल था । एक पल के लिए मेने सोचा कि शायद मुझे प्रोत्साहित करने की उनकी चाल है, मगर फिर लगा कि एसा करने से उन्हें क्या फायदा होगा ?

मैंने कुतूहल दिखाते हुए पूछा, यह सब बताने कि सिद्धि आपको कहाँ से मिली ?

प्रभु की ईच्छा और गुरुकृपा, उन्होंने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा, मेरे गुरु एक समर्थ महापुरुष थे । उन्होंने मुझे हनुमानजी का मंत्र देकर साधना करने की रीत बताई थी । उन दिनों मेरा वैराग्य अत्यंत प्रबल था । रातभर गंगा के तट पर बैठकर मैं हनुमानजी के जप करता था । तब जाकर एक दिन हनुमानजी की कृपा हुई । तत्पश्चात मैं जिस किसीका चहेरा देखुँ उसका भूत, भावि और वर्तमान मुझे साफ दिखाई देता है । जिस तरह दर्पण में आदमी का प्रतिबिंब दिखाई पडता है, बिल्कुल उसी तरह मेरे मन में सामनेवाली व्यक्ति का बीता हुआ और आनेवाल कल साफ दिखाई पडता है ।

मैंने कहा, अगर आप जैसे महापुरुष बंबई जैसे शहर में चले जाय तो लोग पागल हो जायेंगे, और आपको ढेर सारा धन और यश मिलेगा ।

उन्होंने स्मित करते हुए कहा, तुम्हारी बात सही है, मगर मेरा ध्येय यश या संपत्ति पाने का नहीं है । अगर मुझे धनप्राप्ति की कामना होती तो मैं अपनी नौकरी क्यूँ छोडता ? साधना से प्राप्त की गई सिद्धि का उपयोग मनोरंजन या स्वार्थपूर्ति हेतु नहीं होना चाहिए और ना हि धनसंग्रह या प्रदर्शन के लिए । हाँ, कभी कभी साहजिक रूप से उसका प्रयोग हो जाय तो यह अलग बात है अन्यथा उसे गुप्त रखने की जरूरत है । मैं हरदम सावध रहता हूँ ताकि किसीको मेरी यह शक्ति के बारे में पता न चले । मैं तो ईश्वर की इच्छा से आपके पास खींचा चला आया हूँ और आपके प्रति प्रेमभाव होने से आपको यह बातें बता रहा हूँ ।

त्रिकालज्ञ महापुरुष से मेरा वार्तालाप अत्यंत रोचक रहा । उनके मुलाकात करके मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । मेरा हृदय अवनविन भावों से भर गया ।

मैंने कहा, आपके जैसे संतो का दर्शन अतिदुर्लभ है । आपके विचार अति उत्तम है । आपको मिलकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई । आपकी निस्पृहता काबिल-ए-तारीफ है ।

 

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