मैंने दिल्ली से बडौदा जानेवाली ट्रेन पकडी । ट्रेम में मेरी मुलाकात एक मुस्लिम गृहस्थ से हुई । वो मेरी बगलवाली सीट पर बैठे थे । हमारी ट्रेन कुछ ही देर में नई दिल्ली स्टेशन पर आ पहूँची । उस वक्त एक हादसा हुआ । अंधेरे का फायदा उठाकर एक चालाक लडका, जो दरवाजे पर खडा था, किसी मुसाफिर का सामान लेकर छू हो गया । काफि खोज करने पर भी उसका कोई पता नहीं चला । डिब्बे में कई ओर लोग भी थे मगर न जाने क्यूँ, वो मुस्लीम भाई मेरी ओर बार-बार तीरछी नजर से देखा करते थे ।
मेरे पास बिछाने के लिए कुछ खास नहीं था, सिर्फ ओढने के लिए एक कम्बल था । मैंने उसको फैलाकर बैठे-बैठे सोने की कोशिश की । बगल में बैठे मुस्लीम भाई ने सोने का प्रयत्न किया मगर लंबे अरसे तक वे सो नहीं पाये । शायद उनको अपने सामान के हिफाजत की चिंता थी । वे मेरी ओर शक की निगाहों से देख रहे थे ।
सुबह होने पर वे जाग गये और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने लगे । लगता था कि उनको चाय अधिक प्रिय थी । क्योंकि सोडा-लेमन जैसे कोल्ड ड्रींक्स के अलावा कई दफा उन्होंने चाय ली । दोपहर होने पर उन्होंने खाने की थाली मंगाई । शाम होने तक उनका चाय पीने का क्रम जारी रहा ।
मैं उनकी बगल में शांति से बैठा था और सभी गतिविधि का निरीक्षण कर रहा था । गाडी में खाने की मुझे आदत नहीं थी इसलिए मैंने कुछ नहीं खाया, ना ही कुछ पीया । यहाँ तक की मैंने पानी भी नहीं लिया था । काफि देर के बाद ट्रेन दाहोद आ पहूँची । तब जाकर हमारे बीच का मौन तूटा और संवाद का आरंभ हुआ ।
वो मुस्लीम भाई ने प्रश्न किया, ‘आप कहाँ से आ रहे हो ?’
‘ऋषिकेश से’, मैंने उत्तर दिया ।
‘यात्रा हेतु गये थे ?’
‘हाँ’, मैंने संक्षेप में उत्तर दिया ।
मगर आपकी सहनशक्ति गजब की है । मैं देख रहा हूँ की दिल्ली स्टेशन से आप मेरी बगलवाली सीट पर बैठे है, मगर ना तो आपने कुछ खाया है, ना कुछ पिया । क्या आपको भूख-तरस नहीं लगती ?’ उन्होंने आसपास के सब मुसाफिर सुने इतनी जोर से पूछा, औऱ फिर कहा, ‘मैंने तो कई बार चाय पी, नास्ता किया, भोजन लिया ।’
मैंने प्रत्युत्तर दिया, ‘भूख तो मुझे भी लगती है, मगर उसे सहन करने की ताकत है मुझ में । ज्यादातर तो लोग जो खाते है वो आदत से मजबूर होकर खाते है । सच्ची भूख तो दिन में एक-दो दफा ही लगती है । खास करके युवानी में सहन करने की आदत डालनी चाहिए ।’
‘माफ करना’, मेरे उत्तर से प्रसन्न होकर वे कहने लगे, ‘मैं तो आपको कोई चोर समझ रहा था । इसीलिए बार बार आपकी ओर देख रहा था । आपके बाह्य वेश से मैं आपको पहेचान नहीं पाया । आप तो कोई देवपुरुष है । ईतनी कम उम्र में आपने अदभूत सहनशक्ति पायी है । एसा करो, आप मेरे साथ बंबई चलो । वहाँ मेरी लोहे की दुकान है । आप वहीँ रहेना और मेरा अंग्रेजी में पत्रव्यवहार करने का काम संभाल लेना । मैं आपको अच्छा मुआवजा दूँगा । आपके जैसे पवित्र पुरुष के आने से मेरी किस्मत चमक जाएगी । आपने चाहे बडौदा तक की ही टिकट ली है, मगर बडौदा से बंबई तक की टिकट मैं ले लूँगा । बडौदा स्टेशन पर गाडी काफि देर तक रुकती है ।’
मैंने कहा, ‘फिलहाल तो मुझे बडौदा ही जाना है ।’
मगर उन्होंने अपनी बात फिर दोहराई । बातों बातों में गाडी बडौदा आ पहूँची । उन्होंने मुझे समझाने की फिर कोशिश की मगर व्यर्थ रही । मुझे बडौदा उतरना था । उनके मशवरे से मेरे निर्णय में कोई फर्क नहीं पडा ।
मेरे निर्णय से असंतुष्ट होकर वे कहने लगे, ‘मेरी बदकिस्मती है की आप यहाँ उतर जाते हो, मगर जब भी जी करे, आप बंबई आईयेगा । हमारी साथ काम करने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी । मेरा आपको प्यारभरा निमंत्रण है ।’
उनके प्यार और आमंत्रण के लिए मैंने उनका आभार माना और प्लेटफोर्म छोडकर घर जाने के लिए रवाना हुआ ।
उनका बंबई आने का निमंत्रण अभी तक अपूर्ण और अस्वीकृत है । संसार में हम कितने लोगों से मिलते है और बीछडते है, मगर कुछ एसे होते है जो अपनी मधुर यादें छोड जाते है । मुस्लीम सदगृहस्थ उनमें से एक थे ईसमें कोई दोराई नहीं ।

